सहरसा। मिथिला की समृद्ध लोकगाथा परंपरा में कारू खिरहरि एक ऐसे लोकनायक हैं, जिनका व्यक्तित्व भक्ति, पराक्रम और जनकल्याण की भावना से ओतप्रोत रहा है। हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘लोक देवकारू खिरहरि' महान लोकनायक के जीवन, किंवदंतियों और सामाजिक प्रभाव का गहन व प्रामाणिक दस्तावेज प्रस्तुत करती है। इस महत्वपूर्ण कृति के लेखक डॉ० संजय वशिष्ठ हैं, जिन्होंने मिथिला के कोसी अंचल में प्रचलित मौखिक परंपराओं, लोकगाथाओं और जनविश्वासों को आधार बनाकर कारू खिरहरि के जीवन-वृत्त का क्रमबद्ध एवं रोचक विवरण प्रस्तुत किया है। उल्लेखनीय है कि इनकी लोकगाथाएं गायकों के कंठ में सुरक्षित है। कालक्रम में यह गाथाएं लुप्त हो रही है। इस पुस्तक में उनके जन्म, पारिवारिक पृष्ठभूमि, गो-संरक्षक के रूप में उनकी ख्याति, अलौकिक कार्यों से जुड़ी मान्यताएं तथा संत-पुरुष के रूप में उनके सामाजिक योगदान को सधे हुए भाषा-शैली में रखा गया है। मैथिली में प्रकाशित इस शोध कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि डॉ० संजय वशिष्ठ ने कारू खिरहरि को केवल एक दैवी या चमत्कारी व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि समाज-सुधारक, अध्यात्म-प्रेरक और लोकनैतिक आदर्श के रूप में भी चित्रित किया है। संजय वशिष्ठ एक संबन्धन प्राप्त महाविद्यालय में मैथिली के प्राध्यापक भी हैं। लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार कोई असाधारण व्यक्तित्व कालांतर में लोकदेवता का रूप ग्रहण कर लेता है और जनमानस में स्थायी स्थान बना लेता है। पुस्तक की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और लोकसंवेदना से युक्त है, जिससे यह शोधार्थियों के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी समान रूप से उपयोगी बन जाती है। इसलिए इस रचना का व्यापक प्रचार-प्रसार आवश्यक है। मिथिला की लोकसंस्कृति, लोकधर्म और क्षेत्रीय इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यह कृति एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ सिद्ध हो सकती है। अभी जब शूडो साहित्यकार बिना तथ्य और कथ्य के पुस्तक पर अपनी पीठ खुद थपथपा रहे हों और साहित्यकारों पर प्रकाशित पुस्तक में साहित्य अकादमी से सम्मानित साहित्यकार का नाम न होकर बनने वाले साहित्यकार की चर्चा हो तब लोकदेवता पर प्रकाशित ऐसे पुस्तक का महत्व बढ़ जाता है। महिषी के महपुरा में इस लोक देवता का मंदिर भी है। दो दशक पूर्व यहां तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव भी गए थे । इसलिए ऐसे पुस्तकों का कोशी क्षेत्र में समादर होना चाहिए। यह न केवल एक लोकनायक की कथा है, बल्कि यह मिथिला की सांस्कृतिक आत्मा को समझने का एक सशक्त माध्यम भी है।
0 Comments