पुस्तक समीक्षा : "पानी का शाप" : बाढ़ और सुखाड़ की त्रासदी का प्रामाणिक दस्तावेज— डॉ. अरविंद कुमार झा

राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित डॉ. दिनेश कुमार मिश्रा की पुस्तक "पानी का शाप : बिहार में बाढ़ और सुखाड़" बिहार की जल-समस्याओं को समझने के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और प्रामाणिक कृति है। यह केवल बाढ़ और सुखाड़ का विवरण नहीं देती, बल्कि उनके ऐतिहासिक, सामाजिक, तकनीकी और प्रशासनिक पक्षों का तथ्यपरक विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है।

डॉ. मिश्रा ने से सिविल इंजीनियरिंग में उच्च शिक्षा (बी.टेक., एम.टेक. एवं पी-एच.डी.) प्राप्त की। इसके बावजूद उन्होंने सुविधाजनक पेशेवर जीवन के बजाय समाज के बीच रहकर नदियों, बाढ़, सुखाड़ और जल प्रबंधन पर आजीवन अध्ययन और जनजागरण का मार्ग चुना। उनका संपूर्ण लेखन इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान का सर्वोच्च उद्देश्य समाज का कल्याण है। मुझे भी उनसे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला है, इसलिए अनेक लोगों की तरह मैं भी उन्हें आदरपूर्वक अपना गुरु मानता हूँ।

लेखक ने दशकों तक बिहार की नदियों का प्रत्यक्ष अध्ययन किया है। इसी अनुभव का परिणाम उनकी चर्चित पुस्तकें—दो पाटन के बीच, बागमती की सद्गति, बोए पेड़ बबूल का, कोशी : उम्र कैद से मौत तक, बंदिनी महानंदा तथा ऐसे आती है बाढ़—हैं। इन्हीं कृतियों की श्रृंखला में "पानी का शाप" एक ऐसी पुस्तक है, जो बाढ़ और सुखाड़ की समस्या को नई दृष्टि से देखने के लिए प्रेरित करती है।

इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लेखक ने प्रचलित धारणाओं को चुनौती देते हुए अनेक ऐसे प्रश्न उठाए हैं, जिन पर सामान्यतः सरकारी योजनाओं और सार्वजनिक विमर्श में पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। पुस्तक बताती है कि यदि बाढ़ नियंत्रण की परियोजनाएं स्थानीय भूगोल, नदी के स्वभाव, सामाजिक वास्तविकताओं और व्यावहारिक अनुभवों की उपेक्षा कर बनाई जाएँगी, तो वे समाधान के बजाय नई समस्याओं को जन्म देंगी। यही कारण है कि बिहार में बाढ़ और सुखाड़ का संकट आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया है।

यह पुस्तक अभियंताओं, नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा आम पाठकों—सभी के लिए समान रूप से उपयोगी है। लेखक का विश्लेषण तथ्यों, अनुभवों और संवेदनशील दृष्टिकोण पर आधारित है, जो पाठक को गंभीर चिंतन के लिए प्रेरित करता है।

मेरा मानना है कि डॉ. दिनेश कुमार मिश्रा का जल प्रबंधन के क्षेत्र में योगदान राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाना चाहिए। शासन और नीति-निर्माताओं को भी उनके अनुभवों एवं सुझावों का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। यदि विकास योजनाओं में व्यावहारिक दृष्टिकोण और स्थानीय अनुभवों को समुचित स्थान मिले, तभी बाढ़ और सुखाड़ जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान संभव है।

डॉ. मिश्रा का यह श्रम केवल साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। "पानी का शाप" बिहार की जल-समस्याओं को समझने और उनके समाधान पर गंभीर विचार करने के लिए एक अनिवार्य पठनीय पुस्तक है।

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