सहरसा शहर और पर्यावरणीय संकट...


सहरसा। जलवायु परिवर्तन पर काफी बहस हुई है और इसके पक्ष और विपक्ष में काफी बातें कही गई है। लेकिन सहरसा जिले में बढ़ रहे गर्मी और सुख रहे जल स्रोतों को लेकर उसपर गंभीरता से विचार करना होगा। कई विद्वान इस परिवर्तन को वास्तविक मानते हुए उसके दुष्प्रभावों से आम लोगों को सचेत करने, इस परिवर्तन को रोकने या कम से कम करने, यथा स्थिति बनाए रखने और सार्थक प्रयासों से प्राणि-मात्र के कल्याण, के लिए सबको आगाह करते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में इतना जरूर हुआ है कि यह परिवर्तन हो रहा है, इस पर एक आम सहमति बनी है। थोड़ा बहुत मतभेद इस परिवर्तन के प्रभावों को लेकर अभी भी बना हुआ है। इस संदर्भ में अगर हम उत्तर बिहार की चर्चा करें तो कुछ तथ्य सामने आते हैं। पिछले 60-65 वर्षों में यहां 1948, 53, 54, 55, 59, 62, 66,68, 71, 74, 78, 84, 86, 87, 88, 93, 95, 98, 2000, 2002, 2004, 2007 में भीषण बाढ़ें आई हैं, जबकि 1951-52, 56, 61, 67, 72, 82, 83, 92, 2003, 2006, 2009, 2010, 2013 भारी सुखाड़ के वर्ष रहे हैं। हाल के वर्षों में 1992, 2009 और 2013 में सूखे का व्यापक प्रभाव देखने में आया है। पिछली शताब्दी में 1954, 1955, 1968, 1971, 1978 के साथ 1987 की बाढ़ के चर्चे सुनने में आते हैं। इस सब के बीच 2008 कि कुसहा त्रासदी का अपना स्थान है। इतना जरूर है कि अगर कुसहा में कोसी का पूर्वी बायोत्थान बांध नहीं टूटता तो यह साल भी सुखाड़ के खाते में ही जाने वाला था। कुल मिलाकर बारिश का देर से आना, दो बारिशों के बीच ज्यादा अंतराल और वर्षा का सामान्य से कम होना अब आम घटना होती जा रही है। 1992 में जब उत्तर बिहार के कई जिलों में सूखा राहत कार्य चलाना पड़ गया था तब बहुत बड़े नेताओं की भवें तन गई थी कि यहां ऐसा कैसे हो रहा है। सहरसा, जिसकी पहचान ही बाढ़ से होती थी अब सुखाड़ की मार लगातार झेलता है। सहरसा में आम तौर पर वर्षा 1200 मिलीमीटर से अधिक हुआ करती है लेकिन सन् 2000 के बाद केवल एक बार 2007 में ही ऐसा हो पाया। कोसी तटबन्धों के बीच रह रहे लोगों के गांवो में कटाव, बालू जमाव और बाढ़ तो अब स्थाई भाव है। उनके बाहर रह रहे लोगों का जल जमाव को भोगना तो अपने आप में एक अलग मसला है। उसी तरह तटबन्धों के टूटने की आशंका इस नदी के तथाकथित सुरक्षित आबादी पर हमेशा एक लटकती हुई तलवार की तरह है। सहरसा नगर निगम में ड्राईनेज सिस्टम बन नहीं पाया है।

    सहरसा शहर की अगर बात करें तो इसकी तबाही 1930-40 वाले दशक में जबर्दस्त हुई होगी जब कोसी तिलावे धार से धेमुरा धार में आई होगी। इसके कुछ रिकार्ड इतिहास में दर्ज हैं। मगर कोसी पर तटबन्ध बन जाने के बाद सहरसा शहर बाढ़ से अब तक बचा रहा है। यह बचाव कब तक कायम रह पाएगा यह कह पाना मुश्किल है क्योंकि बाढ़ से सुरक्षित तो मधेपुरा जिला मुख्यालय भी था मगर उसकी 2008 में क्या गत बनी वह किसी से छिपी नहीं है। भगवान न करे अगर सहरसा के साथ कभी वैसी स्थिति हो। हालांकि सूखा बाढ़ की तरह एकाएक हमला तो नहीं करता मगर उसका प्रभाव तिल तिल कर सामने आता है। सूखे से ग्रामीण क्षेत्रों का रोजगार छिनता है। बाढ़ में गनीमत रहती है कि शायद रबी की फसल में कुछ हो जाए पर सूखा तो सारी संभावनाएं ही समाप्त कर देता है। दोनो ही परिस्थितियों में पलायन एक समाधान के रूप में सामने आता है जिसका पहला पड़ाव नजदीक का शहर ही होता है। इस तरह गांवों से विस्थापित होने वाले लोग पहला आश्रय सहरसा शहर को मानते है। अभी तो लोग गर्मी को भुगत रहे हैं। सब्जियों कि कीमत बढ़ गई है। अब जबकि गांव में पक्के मकान की संख्या बढ़ी है बाबजूद इस एक माह में कई जगह आगजनी की घटनाएं हुई है। लेकिन वैश्विक तापक्रम में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में यह कहा जाता है कि तापक्रम बढ़ने से गर्मियों मे बर्फ का पिघलना जल्दी शुरू होगा और देर तक जारी रहेगा। बारिश के पानी के साथ-साथ यह अतिरिक्त पानी नदियों की बाढ़ को बढ़ाएगा और वर्षा समाप्त होने के बाद नदियों का जल स्तर नीचे जाएगा और सुखाड़ की परिस्थिति बनेगी। इन दोनों घटनाओं का सीधा असर जीविका के संसाधनों पर विपरीत रूप से पड़ेगा और लोगों का रोजगार प्रभावित होगा तथा पलायन बढ़ेगा। गांव अगर इस तरह की विपत्ति के सम्मुखीन होंगे तो शहर भी अछूता नहीं रह पाएगा। बात केवल बाढ़ या सूखे तक ही सीमित नहीं है। अभी तो 8 जून तक काफी गर्मी की संभावना व्यक्त की गई है। उसके साथ जल जमाव, आगलगी, भूकम्प और चक्रवात आदि कितनी ऐसी प्राकृतिक घटनाएं हैं जिनका हमारे जन-जीवन पर प्रभाव पड़ने वाला है। इसलिए आवश्यकता है इस विषय पर पंचायत स्तर पर विमर्श करने और लोगों को जागरूक करने की।

Post a Comment

0 Comments